Chapter 3 औद्योगिकीकरण का युग The Age of Industrialization Class 10 NCERT History

 

औद्योगिकीकरण का
युग
– global trade routes, spread of
diseases, and labor exchanges, including the effects of the Great Depression
and Bretton Woods.

Chapter 3 औद्योगिकीकरण का युग The Age
of Industrialization

Class 10 NCERT History Solutions in Hindi: भारत और समकालीन
विश्व
-2

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Concept Map

  1. Globalization (वैश्वीकरण)
    • The chapter discusses the impact
      of globalization over the past few decades.
    • वैश्वीकरण
      के पिछले कुछ दशकों में प्रभावों की चर्चा की गई है। यह व्यापार
      , कामकाज और संसाधनों के वैश्विक
      प्रवाह से संबंधित है।
  2. Trade Routes (व्यापार
    मार्ग)
    • The chapter outlines ancient
      trade routes connecting different civilizations.
    • प्राचीन
      व्यापार मार्गों की रूपरेखा दी गई है जो विभिन्न सभ्यताओं को जोड़ते थे
      , जैसे कि सिल्क रोड (रेशम मार्ग)।
  3. Colonialism (औपनिवेशिक
    काल)
    • The chapter highlights how
      colonialism influenced global trade and economy.
    • औपनिवेशिक
      काल ने वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था पर गहरा प्रभाव डाला
      , जिसमें संसाधनों और श्रम का बड़े पैमाने
      पर शोषण शामिल था।
  4. Industrial Revolution (औद्योगिक
    क्रांति)
    • It explores how the Industrial
      Revolution changed production and distribution globally.
    • औद्योगिक
      क्रांति ने उत्पादन और वितरण के तरीकों को वैश्विक स्तर पर बदल दिया
      , जिससे नए उद्योग और आर्थिक मॉडल
      उत्पन्न हुए।
  5. Migration and Labor (प्रवासन और
    श्रम)
    • The movement of people for work
      across borders is a key theme.
    • काम की तलाश
      में लोगों का एक देश से दूसरे देश में प्रवासन एक महत्वपूर्ण विषय है
      , जिससे विभिन्न संस्कृतियों और
      अर्थव्यवस्थाओं पर असर पड़ा।
  6. Technological Advances (प्रौद्योगिकीय
    प्रगति)
    • Discusses the role of technology
      in accelerating globalization.
    • प्रौद्योगिकी
      की प्रगति ने वैश्वीकरण की प्रक्रिया को तेज किया है
      , जिससे संचार और व्यापार अधिक कुशल
      हो गए हैं।

प्रश्न और उत्तर


प्रश्न 1:
वैश्वीकरण
क्या है और इसका दुनिया पर क्या प्रभाव पड़ा है
?

उत्तर:
वैश्वीकरण वह
प्रक्रिया है जिसके तहत दुनिया भर के लोग
, कंपनियाँ और सरकारें आपस में मिलती और एकीकृत होती हैं। इसका
प्रभाव व्यापार
, संचार
और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में वृद्धि के रूप में पड़ा है। इससे कई देशों में
आर्थिक विकास हुआ है
, लेकिन
इसके साथ ही असमानता और पर्यावरणीय चुनौतियों में भी वृद्धि हुई है।


प्रश्न 2:
प्राचीन
व्यापार मार्गों ने वैश्वीकरण में कैसे योगदान दिया
?

उत्तर:
प्राचीन व्यापार
मार्गों
, जैसे
कि रेशम मार्ग
, ने
शुरुआती वैश्वीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन मार्गों के माध्यम से विभिन्न
सभ्यताओं के बीच वस्तुओं
, विचारों
और संस्कृतियों का आदान-प्रदान हुआ। ये मार्ग एशिया
, यूरोप और अफ्रीका के बीच रेशम, मसाले और कीमती धातुओं के व्यापार को
संभव बनाते थे
, जिससे
वैश्विक संपर्क की नींव रखी गई।


प्रश्न 3:
वैश्विक
व्यापार और अर्थव्यवस्था को आकार देने में उपनिवेशवाद की क्या भूमिका थी
?

उत्तर:
उपनिवेशवाद ने
वैश्विक व्यापार और अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया। यूरोपीय शक्तियों ने
उपनिवेशों पर नियंत्रण स्थापित करके उनके संसाधनों का दोहन किया और स्थानीय
श्रमिकों का शोषण किया। उपनिवेशों से प्राप्त कच्चे माल से यूरोपीय देशों ने अपने
उद्योगों को बढ़ावा दिया और निर्मित वस्तुओं का वैश्विक स्तर पर वितरण किया।


प्रश्न 4:
औद्योगिक
क्रांति ने वैश्वीकरण को कैसे तेज किया
?

उत्तर:
औद्योगिक क्रांति ने वैश्वीकरण
को नई तकनीकों के विकास के माध्यम से तेज किया
, जिससे उत्पादन क्षमता और दक्षता में
वृद्धि हुई। इसने बड़े पैमाने पर उत्पादन और वस्तुओं को सस्ती दरों पर लंबी दूरी
तक पहुंचाने की सुविधा दी। रेलमार्गों
, स्टीमशिप्स और टेलीग्राफ के विकास ने दुनिया के विभिन्न
हिस्सों को आपस में जोड़ा और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा दिया।


प्रश्न 5:
प्रवासन
ने वैश्वीकरण की प्रक्रिया में कैसे योगदान दिया
?

उत्तर:
प्रवासन ने लोगों को
बेहतर रोजगार अवसरों के लिए सीमाओं के पार जाने की सुविधा दी
, जिससे वैश्वीकरण की प्रक्रिया में
योगदान हुआ। इसके परिणामस्वरूप सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ और अलग-अलग संस्कृतियों
और अर्थव्यवस्थाओं पर इसका व्यापक प्रभाव पड़ा। प्रवास के माध्यम से नए विचार और
कौशल विभिन्न देशों में फैले
, जिससे
वैश्विक जुड़ाव बढ़ा।

प्रश्न 1 सत्रहवीं
सदी से पहले होने वाले आदान-प्रदान के दो उदाहरण दीजिए। एक उदाहरण एशिया से और एक
उदाहरण पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाओं से चुनें।

· 
एशिया से उदाहरण:
एशिया में रेशम
मार्ग (
Silk Road) एक महत्वपूर्ण व्यापार मार्ग था, जो चीन, भारत, फारस, और यूरोप को जोड़ता था। इसके माध्यम से न
केवल रेशम और मसाले जैसी कीमती वस्तुओं का आदान-प्रदान हुआ
, बल्कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी और सांस्कृतिक विचारों का
भी प्रसार हुआ। यह मार्ग एक प्रकार का सांस्कृतिक और आर्थिक उपहार था जिसने कई
सभ्यताओं को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

· 
पश्चिमी देशों से
उदाहरण:

औपनिवेशिक काल में, यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका, एशिया और अमेरिका जैसे क्षेत्रों से
संसाधनों का दोहन किया। विशेषकर पश्चिमी देशों ने उपनिवेशों से बड़े पैमाने पर
कच्चे माल और श्रम का शोषण किया
, जिससे उनकी आर्थिक
समृद्धि बढ़ी। इस शोषण को पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं के लिए एकतरफा लाभ और उपनिवेशित
देशों के लिए एकतरफा हानि के रूप में देखा जा सकता है।

 

2. बताइए कि पूर्व-आधुनिक दुनिया में
बीमारियों के वैश्विक प्रसार ने पश्चिमी हिस्सों के औद्योगिकीकरण में किस प्रकार
सहायता की।

बीमारियों के
वैश्विक प्रसार ने पूर्व-आधुनिक दुनिया में कई तरीकों से प्रभाव डाला। जब यूरोपीय
शक्तियां नई दुनिया (अमेरिका) और एशिया के संपर्क में आईं
, तो उनके द्वारा लाए गए रोगों ने स्थानीय
आबादी को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया। उदाहरण के लिए
, अमेरिका के मूल निवासियों में यूरोपीय
बीमारियों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता नहीं थी
, जिसके कारण बड़ी संख्या में लोग मारे गए। इससे यूरोपीय
शक्तियों को इन क्षेत्रों में मजदूरों की आपूर्ति के लिए अफ्रीका से दासों को लाने
की आवश्यकता पड़ी
, जो औद्योगिकीकरण के लिए श्रम बल के रूप
में काम आए।


3. निम्नलिखित प्रभावों की व्याख्या करते
हुए संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखिए:

(द) कॉर्न लॉ को समाप्त करने के बारे में
ब्रिटिश सरकार का फैसला:

कॉर्न लॉ (Corn Law) का अंत ब्रिटेन में कृषि आयात पर लगे
प्रतिबंधों को हटाने से संबंधित था। इस कानून के हटने से सस्ते अनाज का आयात संभव
हुआ
, जिससे गरीब वर्गों के लिए खाद्य सामग्री
की उपलब्धता बढ़ी और उद्योगों में काम करने वाले मजदूरों के जीवन स्तर में सुधार
हुआ। इससे औद्योगिक उत्पादन में भी तेजी आई।

(ख) अफ्रीका में मलेरिया का प्रकोप:
औद्योगिकीकरण के
दौरान अफ्रीका में मलेरिया के प्रकोप ने यूरोपीय शक्तियों को उस क्षेत्र में
विस्तार करने से रोक दिया। इस बीमारी ने कई यूरोपीय श्रमिकों और उपनिवेशवादियों की
जान ली
, जिससे अफ्रीका के कई हिस्से औद्योगिक और
कृषि विकास से अछूते रह गए। यह बीमारी वैश्विक व्यापार और विकास में एक बड़ी बाधा
साबित हुई।

(ग) वैश्विक महामारियों के कारण यूरोप में
कामकाजी उम्र के पुरुषों की मौत:

महामारियों, जैसे प्लेग, ने यूरोप में कामकाजी उम्र के पुरुषों की
आबादी को गंभीर रूप से प्रभावित किया। इससे श्रम की कमी हो गई
, जिससे मजदूरी बढ़ गई और कृषि तथा उद्योग
में नवाचारों की आवश्यकता उत्पन्न हुई। इसका परिणाम अंततः यूरोप में औद्योगिक
क्रांति के रूप में सामने आया।

(घ) भारतीय अर्थव्यवस्था पर बाढ़ का
प्रभाव:

प्राकृतिक आपदाओं, जैसे बाढ़, ने भारतीय अर्थव्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित किया।
कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था में बाढ़ ने फसलों को नष्ट कर दिया
, जिससे खाद्य संकट और भुखमरी की स्थितियां
उत्पन्न हुईं। इसके अलावा
, बाढ़ ने आर्थिक अस्थिरता और गरीबी को
बढ़ावा दिया
, जिससे व्यापार और उत्पादन पर नकारात्मक
प्रभाव पड़ा।

(ङ) बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपने
उत्पादन को एशियाई देशों में स्थापित करने का निर्णय:

बहुराष्ट्रीय
कंपनियों ने अपने उत्पादन को सस्ते श्रम और कम उत्पादन लागत वाले एशियाई देशों में
स्थानांतरित किया। इससे इन देशों में रोजगार के अवसर बढ़े
, लेकिन साथ ही श्रमिकों का शोषण और
पर्यावरणीय क्षति भी हुई। इस निर्णय ने एशियाई देशों को वैश्विक उत्पादन केंद्रों
के रूप में उभारा
, जबकि विकसित देशों में औद्योगिक
गतिविधियां कम होने लगीं।


4. खाद्य उपलब्धता पर प्रौद्योगिकी के
प्रभाव को दिखाने के लिए इतिहास से दो उदाहरण दीजिए।

  • पहला उदाहरण: औद्योगिक
    क्रांति के दौरान
    , नई तकनीकों
    ने कृषि उत्पादन को बढ़ाने में मदद की। जैसे मशीनों के उपयोग से खेती अधिक
    कुशल हो गई और उत्पादन में वृद्धि हुई। इससे खाद्य आपूर्ति में वृद्धि हुई और
    कीमतें कम हुईं।
  • दूसरा
    उदाहरण:
    20वीं शताब्दी
    में हरित क्रांति ने उन्नत बीज
    , सिंचाई और रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से वैश्विक खाद्य
    उत्पादन को बढ़ाया। इसने विकासशील देशों में खाद्य सुरक्षा को मजबूत किया और
    भुखमरी की दरों को कम किया।


5. ब्रेटन वुड्स समझौतों का क्या अर्थ है?

उत्तर:
ब्रेटन वुड्स
समझौते
1944 में हुए अंतर्राष्ट्रीय समझौते हैं, जिनके तहत अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक की स्थापना की गई थी। इन
समझौतों का उद्देश्य युद्ध के बाद की दुनिया में आर्थिक स्थिरता बनाए रखना
, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को बढ़ावा देना
और विकासशील देशों की आर्थिक समस्याओं को सुलझाना था। ब्रेटन वुड्स प्रणाली ने
वैश्विक आर्थिक सहयोग और मुद्रा विनिमय की एक नई व्यवस्था की नींव रखी।

6. कृपया कल्पना कीजिए कि आप ओस्फेरिया क्षेत्र
में काम करने वाले प्रवासी श्रमिक हैं। इस विवरण के आधार पर अपने वर्तमान जीवन और
अपनी भावनाओं का वर्णन करते हुए अपने परिवार के नाम एक पत्र लिखिए।
पत्र लिखिए:
प्रिय पिताजी,
मैं यहाँ
ओस्फेरिया के क्षेत्र में काम कर रहा हूँ। यहां की जीवनशैली और कार्यसंस्कृति
बिल्कुल भिन्न है। मेरे साथी मजदूर और मैं हर दिन लंबी दूरी तय करते हैं और कठिन
परिश्रम करते हैं। यहाँ की स्थिति हमारे देश से बहुत अलग है। परिवार की याद बहुत
आती है
, लेकिन मैं यहां अपनी जिम्मेदारियों को
निभा रहा हूँ। उम्मीद है कि मैं जल्द ही वापस आकर आप सबके साथ रहूंगा।

आपका बेटा,
[
नाम]


7. अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक गतिविधियों में
तीन प्रकार की गतिविधियों की व्याख्या करें:

  1. व्यापार (Trade):
    व्यापार के
    माध्यम से विभिन्न देश वस्त्र
    , कृषि उत्पाद, और प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान करते हैं। भारत जैसे
    देश वस्त्र और मसाले निर्यात करते थे
    , जबकि मशीनरी और उर्वरक आयात करते हैं।
  2. श्रम का
    प्रवास (
    Labour
    Migration):

    मजदूर रोजगार
    की तलाश में एक देश से दूसरे देश में प्रवास करते हैं। उदाहरण के लिए
    , भारतीय मजदूर ब्रिटिश उपनिवेशों में
    काम करने के लिए भेजे गए थे।
  3. निवेश (Investment):
    विदेशी
    कंपनियाँ विकासशील देशों में अपने उद्योग स्थापित करती हैं। भारत में कई
    बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना निवेश किया है
    , जिससे रोजगार के अवसर बढ़े हैं।


8. महामंदी के कारणों की व्याख्या करें:
महामंदी (Great Depression) के प्रमुख कारणों में शेयर बाजार का पतन, बैंकों का असफल होना, और कृषि उत्पादन में गिरावट शामिल थे।
अमेरिका और यूरोप में बैंकों के बंद होने से लोग अपनी बचत खो बैठे
, और निवेश बंद हो गया। इसके साथ ही वैश्विक
व्यापार में भारी गिरावट आई और बेरोजगारी चरम पर पहुँच गई।


9. G-77 देशों के बारे में आपकी क्या राय है? G-77 को ब्रेटन वुड्स की संस्थाओं की
प्रतिक्रिया के रूप में क्यों देखा जा सकता है
?
G-77
विकासशील देशों का
एक समूह है जो आर्थिक असमानता को दूर करने और अपने विकास के लिए सहयोग बढ़ाने के
लिए एकजुट हुआ था। इसे ब्रेटन वुड्स संस्थाओं की प्रतिक्रिया के रूप में देखा जा
सकता है
, क्योंकि ब्रेटन वुड्स संस्थाओं जैसे IMF और विश्व बैंक का नियंत्रण विकसित देशों
के पास था
, जबकि विकासशील देशों के हितों को अक्सर
नजरअंदाज किया जाता था।
G-77 देशों ने एकजुट होकर अपने आर्थिक और
व्यापारिक हितों की रक्षा के लिए वैश्विक मंचों पर आवाज उठाई।

Project Work

मध्‍य 19वीं सदी के दौरान दक्षिण अफ्रीका में सोने और
हीरे की खोज के बारे में विस्तार से जानकारी दीजिए। इन खनिज संसाधनों के उत्‍खनन
और प्रबंधन की व्‍यवस्‍था किसके अधीन थी
?
खदानों में काम करने वाले लोग कौन थे और उनका
जीवन कैसा था
?

मध्‍य 19वीं सदी के दौरान दक्षिण अफ्रीका में
हीरे की खदानों और सोने की खोज का महत्वपूर्ण स्थान था। इस क्षेत्र में हीरे और
सोने की खोज ने उपनिवेशवादी शक्तियों
, विशेष रूप से ब्रिटिश और डच, को इस क्षेत्र की ओर आकर्षित किया। हीरे
और सोने की खदानों की खोज ने दक्षिण अफ्रीका को वैश्विक व्यापार और उद्योग का
केंद्र बना दिया था। खदानों की व्यवस्था और नियंत्रण भी उपनिवेशवादी सरकारों के
हाथ में था।

1.     हीरे की खोज और खनन:
1867 में दक्षिण अफ्रीका
के किम्बर्ले क्षेत्र में पहला हीरा खोजा गया था। इसके बाद इस क्षेत्र में बड़े
पैमाने पर हीरा खनन शुरू हुआ। किम्बर्ले खान विश्व की सबसे बड़ी हीरा खदानों में
से एक बनी और इसके कारण स्थानीय अर्थव्यवस्था में भारी बदलाव आया। यहाँ काम करने
वाले श्रमिकों को कठिन परिस्थितियों में काम करना पड़ता था
, और अधिकतर श्रमिक अफ्रीका के ही होते थे,
जिन पर
उपनिवेशवादियों का कड़ा नियंत्रण था।

2.     सोने की खोज और खनन:
1886 में जोहान्सबर्ग के
पास विटवाटरसरैंड क्षेत्र में सोने की खोज हुई। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे बड़े
सोने के भंडारों में से एक था। सोने की खोज से दक्षिण अफ्रीका की अर्थव्यवस्था को
और गति मिली। यहां भी ब्रिटिश उपनिवेशवादियों ने खनन का नियंत्रण अपने हाथों में
ले लिया और बड़े पैमाने पर श्रमिकों को कम मजदूरी पर काम कराया गया।

3.     प्रबंधन और नियंत्रण:
हीरे और सोने की
खदानों का प्रबंधन ब्रिटिश उपनिवेशवादियों और बड़ी खनन कंपनियों के हाथों में था।
डेबियर्स जैसी कंपनियाँ
, जिनका
हीरा उद्योग पर एकाधिकार था
, श्रमिकों
का शोषण करती थीं और उन्हें कठिन परिस्थितियों में काम करने के लिए मजबूर करती
थीं। श्रमिकों को खनन शिविरों में रखा जाता था और उन्हें उनके परिवारों से दूर रखा
जाता था
, जिससे
उनका जीवन बेहद कठिन हो जाता था।

4.     जीवन और संघर्ष:
खदानों में काम करने
वाले श्रमिक मुख्यतः अफ्रीकी होते थे
, जो उपनिवेशवादियों के कड़े नियमों के अधीन काम करते थे। उन्हें
न्यूनतम मजदूरी मिलती थी और उनके कार्य स्थल पर स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी थी।
उनके जीवन में आर्थिक तंगी और सामाजिक असमानता का सामना करना पड़ता था। खनन
क्षेत्र में काम करने वालों के लिए जीवन बहुत कठिन था और उन्होंने अपने अधिकारों
के लिए संघर्ष भी किया
, जिसके
परिणामस्वरूप बाद में मजदूर आंदोलनों का उदय हुआ।

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